-डॉ. अशोक कुमार वर्मा आज भागदौड़ के साथ साथ प्रतिस्पर्धा के युग में मनुष्य कब तनाव में चला जाता है इसका पता ही नहीं लगता।अनेक बार व्यक्ति सफलता की सीढ़ियों के बिल्कुल निकट पहुंचकर भी फिसल जाता है और तब आरम्भ होता है अवसाद का दौर और नशे की और आकर्षण।यदि ऐसे समय में कोई सँभालने वाला न हो तो मनुष्य किसी भी कुमार्ग पर जा सकता है। आज एक ऐसे युवक की कहानी आपको बताता हूँ जो एक निजी विद्यालय में शिक्षक था और कोरोना के समय के कुछ समय पश्चात नौकरी छूट गई सरकारी नौकरी के लिए प्रयास किया और वहां पर भी अंतिम चरण में असफल होने पर बहुत दुःख हुआ और अवसाद एवं तनाव को कम करने के लिए नशे का शिकार हो गया।घर वालों ने बहुत समझाया लेकिन उनकी एक न चली। नशे की लत में वह नशीले टीके तक लगाने लगा था। घर वालों ने निजी संस्थानों में बहुत उपचार भी करवाया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि तन-मन और धन का शोषण हुआ। और एक दिन ऐसा आया कि ड्रग्स ने उसके प्राण हर लिए। एक ऐसे युवक के जीवन का अंत हुआ जो स्वयं एक शिक्षक था।जो अन्य लोगों के जीवन में प्रकाश करने का कार्य करता था लेकिन नशे ने उसे एक स्थिति में खड़ा कर दिया था। उस युवक ने नौकरी न मिलने के कारण नशे को अपना साथी बना लिया था।ये कहानी न केवल उस युवक की है जिसने नशे में पड़कर अपने जीवन को समाप्त किया अपितु और भी ऐसे बहुत युवक हो सकते हैं जो असफलता के कारण नशे का शिकार हो जाते हैं।आज इस बात की आवश्यकता है कि शिक्षा नीति में नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रणाली को जोड़ा जाए और प्रत्येक कक्षा के पाठ्यक्रमों में स्थान दिया जाए।इतना ही नहीं नशे का शिकार हो चुके लोगों के पुनर्वास की सुव्यवस्था की जाए।
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By Digital Desk